
धरमजयगढ़ में S.E.C.L. की दुर्गापुर–2 ओपनकास्ट खान परियोजना को लेकर एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है। ग्रामवासियों द्वारा हाल ही में DGPS सर्वे का विरोध सामने आया है, लेकिन विशेषज्ञों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार यह पूरा मामला अब और गंभीर हो गया है। कारण—यह विरोध धारा 11(1) के जारी होने के करीब 10 वर्ष बाद उठाया जा रहा है, जबकि कानून कई जगह सरकार के अधिकार को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है।
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???? केंद्र में है 1996 का ‘पैशा कानून’ — ग्रामसभा के अधिकार बनाम खनिज पर सरकार का दखल
24 दिसंबर 1996 को राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों हेतु पारित PESA (पैशा) कानून आदिवासी स्वशासन पर आधारित भारत का पहला बड़ा कानून है।
इसमें ग्रामसभा को समाज की सर्वोच्च संस्था माना गया है—लोकसभा–राज्यसभा से भी ऊपर।
कानून में ग्रामसभा को विकास, संसाधन, वनाधिकार, बाजार, संस्थागत निगरानी समेत कई शक्तियाँ दी गई हैं, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
सामुदायिक संसाधनों की रक्षा
लघु वनोपज की पूर्ण मालिकी
स्थानीय जल–जंगल–जमीन पर नियंत्रण
खनिज संसाधन संबंधी सिफारिश का अधिकार
लेकिन खनिज सम्पदा के मामले में पैशा कानून एक खास पंक्ति में सरकार का अधिकार भी बरकरार रखता है—
“यद्यपि सरकार ने खनिज सम्पदा पर अब तक चले आ रहे अपने अधिकार को बरकरार रखा है।”
यानी पट्टा, अधिभोग, खनन अनुमति जैसे अंतिम निर्णय सरकार के हाथ में ही रहते हैं।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013—धारा 81 सरकार को देती है अस्थायी अधिग्रहण की पूरी शक्ति
भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम 2013 की धारा 81 बेहद महत्वपूर्ण है।
इसके अनुसार —
यदि लोक प्रयोजन आवश्यक हो और प्रतिकर पर विवाद हो
तो समुचित सरकार कलेक्टर को किसी भी बंजर अथवा कृषि भूमि का 3 वर्ष या उससे अधिक अवधि तक अस्थायी अधिभोग का पूर्ण अधिकार दे सकती है।
यानी यदि परियोजना "public purpose" में आती है, तो प्रशासन भूमि का उपयोग जारी रख सकता है।
विवाद की जड़ — SECL का धारा 11(1) नोटिफिकेशन और 10 वर्षों बाद उठी आपत्ति
SECL की दुर्गापुर–2 ओपनकास्ट खदान हेतु:
धारा 11(1) का प्रकाशन 2016 में हो चुका है
इसके 10 वर्ष बाद अब DGPS सर्वे पर विरोध शुरू हुआ है
विरोधकर्ता इसे ग्रामसभा अधिकारों का अतिक्रमण बता रहे हैं
जब पैशा कानून सामुदायिक संसाधनों पर ग्रामसभा की भूमिका मानता है,
वहीं खनिज सम्पदा पर सरकार का अधिकार अक्षुण्ण घोषित करता है।
और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 की धारा 81 सरकार तथा कलेक्टर को सीधा हस्तक्षेप का अधिकार देती है।
ऐसी स्थिति में 10 वर्ष बाद उठाया गया विरोध कानूनी रूप से सीधे सरकार की प्रक्रिया को चुनौती माना जा रहा है, जो विवाद को और जटिल बनाता है।
बहर हाल
धरमजयगढ़ का यह मामला अब सिर्फ सर्वे रुकवाने का नहीं रहा,
बल्कि पैशा कानून के ग्रामसभा अधिकार,
खनिज पर शासन की सर्वोच्चता,
और भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 81
इन तीन कानूनी शक्तियों की टकराहट का संवेदनशील उदाहरण बन गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब यह विवाद प्रशासनिक अधिकार बनाम ग्रामसभा के संवैधानिक अधिकार के बीच एक गंभीर कानूनी परीक्षा में बदल चुका है।
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