
धरमजयगढ़। संगठनात्मक अनुशासन और शीर्ष नेतृत्व के निर्देशों के पालन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताने वाली भारतीय जनता पार्टी के धरमजयगढ़ मंडल में इन दिनों स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं का समर्थन करने के बजाय सत्ता पक्ष से जुड़े कुछ लोग ही विरोध की राजनीति करते नजर आ रहे हैं।
केंद्र और राज्य सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को ध्यान में रखते हुए धरमजयगढ़ क्षेत्र में कई कोयला परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान की है। सरकार की ओर से प्रभावित किसानों के लिए पुनर्वास नीति, मुआवजा और अन्य अधिकारों को लेकर स्पष्ट प्रावधान भी निर्धारित किए गए हैं। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर विरोध और भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
धरमजयगढ़ क्षेत्र में कोयला संपदा प्रचुर मात्रा में होने के कारण कई सरकारी और निजी कंपनियों को उत्खनन की अनुमति दी गई है। इनमें भारत की नवरत्न कोयला कंपनी को वर्ष 2015 में दुर्गापुर-2 परियोजना के लिए लगभग 4144 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन लगभग बारह वर्षों के बाद भी परियोजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी।
अब जब ड्रोन सर्वे और गणना की प्रक्रिया प्रारंभ करने की पहल हुई है, तब विरोध के स्वर एक बार फिर मुखर होने लगे हैं। सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यह खड़ा हो रहा है कि यदि परियोजना सरकार की नीति और प्राथमिकता का हिस्सा है, तो फिर सत्ताधारी दल से जुड़े कुछ लोग इसके विरोध में क्यों दिखाई दे रहे हैं?
राजनीतिक चर्चाओं में यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि कुछ स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि परिस्थितियों के अनुसार अपना रुख बदलते रहे हैं। बंद कमरों और फोन पर परियोजनाओं की जानकारी लेने वाले लोग सार्वजनिक मंचों पर विरोध का चेहरा बनते नजर आते हैं। इससे सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक समन्वय पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे गंभीर सवाल भाजपा संगठन की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। यदि सत्ताधारी दल के लोग ही सरकार की योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगें, तो संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व के निर्देशों की स्थिति क्या रह जाती है? क्या धरमजयगढ़ मंडल भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने में असफल है, या फिर स्थानीय राजनीति में व्यक्तिगत हित संगठनात्मक प्रतिबद्धताओं पर भारी पड़ रहे हैं?
कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि विकास और रोजगार जैसे मुद्दों पर स्पष्ट संवाद और पारदर्शिता की आवश्यकता है। प्रभावित किसानों को भी राजनीतिक शोर-शराबे और दलगत खींचतान से ऊपर उठकर अपने अधिकारों, उचित मुआवजे, पुनर्वास और विस्थापन से जुड़े मुद्दों पर एकजुट होकर अपनी बात रखने की आवश्यकता है।
बारह वर्षों की देरी ने क्षेत्र के विकास, निवेश और रोजगार की संभावनाओं को कितना प्रभावित किया है, इसका गंभीर मूल्यांकन होना चाहिए। यदि सरकार अपने निर्णय पर कायम है और परियोजनाएं आगे बढ़नी ही हैं, तो प्रभावित परिवारों के हितों की अधिकतम सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन और कंपनियों दोनों की जिम्मेदारी है।
धरमजयगढ़ की राजनीति में आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सत्ता पक्ष सरकार की नीतियों के साथ मजबूती से खड़ा है, या फिर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक विरोध और संगठनात्मक असंतुलन सरकार की योजनाओं के रास्ते में नई बाधाएं खड़ी कर रहा है?
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